World Book & Copyright Day-23rd April
आएं करें किताबों से दोस्ती
लाइफ कोच हैं किताबें
किताबें न सिर्फ कई नई जानकारियां देती हैं, बल्कि हमारे जीवन की कई समस्याओं का निदान भी बताती हैं। यदि बच्चों-किशोरों में छोटी उम्र से ही पढ़ने की आदत डाली जाए, तो बड़े होने पर किताबों के प्रति उनका प्रेम बना रहेगा और उन्हें अपना लक्ष्य पाने में भी आसानी होगी।
हाल में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में जश्न इवेंट लिटरेचर कार्निवल संपन्न हुआ, जिसमें बुक रीडिंग, स्टोरी टेलिंग, कविता पाठ आदि जैसी कई रचनात्मक एक्टिविटीज का आयोजन हुआ। कार्निवल की आयोजक सीमा सक्सेना ने बताया कि इस आयोजन का मकसद लोगों खासकर बच्चों-किशोरों में किताबों के प्रति जागरूकता पैदा करना और रीडिंग हैबिट डेवलप करना था। इस कार्यक्रम में शामिल हुए ज्यादातर लेखकों-पाठकों का मानना था कि यदि अभिभावक चाहेंगे, तो वे योजनाबद्ध तरीके से छोटी उम्र में ही बच्चों में किताबें पढ़ने, कविता-कहानियां पढ़ने-सुनने की आदत डाल सकते हैं। दरअसल, किताबें लाइफ कोच के समान हैं, जो जीवन और करियर दोनों में सही राह दिखाती हैं। यही वजह है कि कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांव-गांव में "किताब प्याओ' या "बुक बैंक' बनाने की बात कही थी। इससे बच्चे पढ़ने के लिए प्रेरित होंगे। आज देश के अलग-अलग हिस्सों में लाइब्रेरी आंदोलन चलाया जा रहा है। जैसे बिहार के किशनगंज जिले में सीमांचल लाइब्रेरी फाउंडेशन द्वारा किताबों के माध्यम से बच्चों-किशोरों-युवाओं को पढ़ने व जागरूक बनाने की मुहिम चल रही है। इसके तहत तीन पुस्तकालय की स्थापना की गई है। आने वाले समय में जिले के हर गांव में एक सार्वजनिक पुस्तकालय खोलने की योजना है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने भी बच्चों में रीडिंग की आदत विकसित करने के लिए कुछ समय पहले ‘रीडिंग मिशन’ लांच किया है। सीबीएसई से संबंधित सभी स्कूलों में इसे लागू किया जाना है। मिशन का उद्देश्य बच्चों को किताबों से जोड़ना है। महान लेखक आर के नारायण के अनुसार, किताबें उस दर्द निवारक मल्हम के समान हैं, जो असफलता मिलने पर भी दुख का एहसास नहीं होने देती है। इसलिए व्यक्तित्व विकास में अहम भूमिका निभाती हैं किताबें।
किताबों में मिला समस्याओं का हल
चेन्नई की 18 साल की अंशु मलिका रोजा सेल्वामनी की किताब "द फ्लेम इन माय हार्ट' इन दिनों पाठकों के बीच लोकप्रिय साबित हो रही है। इस किताब में उन्होंने अपने डर, असुरक्षा, सदमे जैसे नकारात्मक और खुशी, उत्साह जैसे सकारात्मक मनोभावों को कविता और कहानियों के रूप में व्यक्त किया है। बचपन में अंशु किसी से ज्यादा बातचीत नहीं कर पाती थीं। वे स्वयं को दूसरों से कमतर आंकती और हमेशा खोई-खोई रहतीं। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत समस्याओं का हल किताबों में ढूंढा और उन्हें मिला भी। जब वे किताबें पढ़ रही होतीं, तो उन्हें सुकून और शांति मिलती। इसलिए किताबों के पन्नों के बीच वे खुद को सुरक्षित महसूस करने लगीं। किताबें पढ़ने का यह सिलसिला चल निकला। वे त्याहारों या किसी खास अवसर पर अपने लिए किताबें खरीदने लगीं। अंशु किताबें पढ़ने के लिए दूसरों को भी प्रेरित करने लगीं। वे कहती है, "यदि अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे किताबों से जुड़ें, तो उन्हें सबसे पहले यह जानना होगा कि उनके बच्चे को कौन-से जॉनर की किताबें अधिक पसंद हैं? अगर उनके बच्चे किसी खास टीवी शो या इंटरनेट प्रोग्राम के दीवाने हैं, तो वे उसी टॉपिक से संबंधित किताबें उन्हें पढ़ने के लिए दें। उन्हें किताबों से जोड़ने का यह सबसे अच्छा तरीका है। यदि मां-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे किताबों से जुड़ें, तो दिन भर में कम से कम 20 मिनट वे भी उनके सामने अपनी पसंद की किताबें पढ़ें। एप्पल कंपनी के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स ने भी कहा था कि जब भी वे लो फील करते थे, किताबें उन्हें संभालने का काम करती थीं। किताबें उनके लिए टॉनिक के समान थीं। स्टीव मानते थे कि उनके व्यक्तित्व विकास में कई किताबों ने अहम भूमिका निभाई।
लक्ष्य हासिल करने में मदद
किशोरों के लिए "13 स्टेप्स टू ब्लडी गुड लक' और "13 स्टेप्स टू ब्लडी गुड वेल्द' किताब लिखने वाले मशहूर लेखक अश्विन सांघी ने हमारे साथ अपने बचपन की कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि उनके नाना न सिर्फ कवि थे, बल्कि वे किताबें भी खूब पढ़ा करते थे। वे हर हफ्ते कानपुर से मुंबई अश्विन को एक किताब भेजा करते। फिर वे उन्हें उस किताब के बारे में पत्र लिखने के लिए कहते। वे पत्र में यह जिक्र करने के लिए कहते कि वह किताब उन्हें पसंद या नापसंद क्यों है? यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहा। इस तरह अश्विन के नाना ने उनके मन में किताबों के प्रति प्रेम जगा दिया। वे नई किताबें पढ़ने और उनके बारे में जानने की कोशिश करने लगे। संयोगवश वर्ष 2005 में वे श्रीनगर के बीचों-बीच स्थित एक दरगाह रोजाबल गए। इस दरगाह के बारे में कहा जाता है कि वहां दफनाया गया व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि स्वयं ईसा मसीह हैं। बस यहीं पर अश्विन का लेखक बनना तय हो गया। दरगाह के बारे में जानकारी मिलते ही वे उससे संबंधित हर किताब पढ़ने और उसके बारे में शोध करने लगे। 12 महीने में उन्होंने 57 किताबें पढ़ लीं। इसके बाद उन्होंने अपनी पहली किताब "द रोजाबल लाइन' लिखनी शुरू कर दी। अश्विन ने बताया, "जब उन्होंने अपनी पहली किताब लिखनी शुरू की, तब उन्हें अपने नाना द्वारा कम उम्र से ही बच्चों को किताबों से परिचित कराने का महत्व समझ में आया। कई सेल्फ हेल्प किताबें ऐसी हैं, जो आपको अपना करियर चुनने और लक्ष्य हासिल करने में मदद करती हैं।'
स्टोरीटेलिंग से किताबों का रास्ता
इन दिनों दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, सिक्किम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश आदि राज्यों में जगह-जगह पर अक्सर स्टोरी टेलिंग के कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। इसमें लोक कलाओं और लोक कहानियों की भी खूब मदद ली जाती है। लेखक सबर्णा रॉय कहते हैं, "अपनी कहानी सुनाना और किसी की कहानी पढ़ना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब हम किसी की कहानी सुनते या पढ़ते हैं, तो हम खुद को उस कहानी से जोड़ लेते हैं। हम अपने जीवन की समस्याओं का हल उस कहानी में ढूंढने लगते हैं। मशहूर स्टोरी टेलर उषा छाबरा ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था-स्टोरीटेलिंग बच्चों-किशोरों को किताबों से जोड़ने का एक बढ़िया माध्यम है। जब स्टोरी टेलर के माध्यम से किसी खास विषय के बारे में कहानियां सुनी जाती है, तो वह मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। व्यक्ति में उस विषय के प्रति उत्सुकता पैदा हो जाती है। वह उसके बारे में और अधिक जानकारियां जुटाने के लिए किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित होता है।
उपहार में दें किताबें
बच्चों-किशोरों के लिए किताबें आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए। स्कूल की लाइब्रेरी में भी अलग-अलग जॉनर की अच्छी किताबें मौजूद होनी चाहिए। तभी वे अपने पसंद की किताबें पढ़ सकेंगे। अभिभावकों को स्वयं भी किताबें पढ़नी चाहिए। तभी वे बच्चों से किताबें पढ़ने के लिए कह सकेंगे। त्योहार और जन्मदिन पर उन्हें बच्चों को उपहार में किताबें देनी चाहिए। इससे किताबों के प्रति उनमें दिलचस्पी पैदा होती है और रीडिंग हैबिट भी डेपलप होती है। शहर में यदि कहीं पुस्तक मेला लगा हो, तो उसमें बच्चों को जरूर ले जाना चाहिए।
रस्किन बॉन्ड, मशहूर लेखक
किताबों से मिलती हैं कई नई जानकारियां
घर पर मुझे बचपन में किसी भी चीज को देखने या पढ़ने के बाद उसे लिखने को कहा जाता था। इस तरह से पढ़ने और लिखने की आदत छोटी उम्र में ही हो गई। यदि आपमें किताबें पढ़ने की आदत नहीं है, तो आप कई चीजों के बारे में जान नहीं पाएंगे। पढ़ने से व्यक्तित्व का सही विकास होता है।
सुधा मूर्ति, लेखिका
किताबों से जोड़ने के लिए वर्कशॉप्स
बच्चों को किताबों से जोड़ने के लिए एनबीटी प्रयास करती रहती है। जगह-जगह लाइब्रेरी वैन, वर्कशॉप्स के माध्यम से बच्चाें के बीच किताबों की जानकारी और उनका प्रमोशन किया जाता रहता है। गुवाहाटी, अगरतला में हमारे बुक प्रमोशन सेंटर्स हैं। बच्चों को किताबों से जोड़ने के लिए मणिपुर और सिक्किम में कुछ समय पहले वर्कशॉप्स आयोजित कराई गई। कोविड 19 के समय कई ऑनलाइन इवेंट के माध्यम से बच्चों में किताबें पढ़ने की आदत विकसित करने की कोशिश की गई। नये थीम्स और नये विषयों पर अक्सर एनबीटी पठन सामग्री लाती रहती है।
युवराज मलिक, एनबीटी डायरेक्टर
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