सफलता की राह पर चलने में ‘मां’ बनीं प्रेरणापुंज

मां जीवन की पहली गुरु और मार्गदर्शक होती है. तभी तो मनुष्य के जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव मां का पड़ता है. संतान के जीवन में मां के योगदान को सम्मान दिलाने के लिए ही विश्व भर में मदर्स डे मनाने की शुरुआत हुई. इसका उल्लेख किताबों में भी मिलता है. इस वर्ष मदर्स डे पर हम ऐसे सम्मानित व्यक्तियों के बारे में जानेंगे, जिन्होंने अपनी किताबों में जीवन पर अपनी मां के प्रभाव, योगदान और उनसे मिली प्रेरणा के बारे में विस्तार से बताया है. महान रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की ने अपने विश्वविख्यात उपन्यास "मां" के जरिए कहा है कि जीवन में बच्चों पर मां का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है. तभी तो ‘मां’ उपन्यास की नायिका और मां पेलेगेया निलोवना सिर्फ एक गृहणी है, लेकिन बेटा पावेल मां के जीवन संघर्षों से ही प्रेरणा लेता है और समाज हित में एक क्रांतिकारी बन जाता है. बाद में बेटे के कार्यों से प्रभावित होकर मां भी सामाजिक न्याय के लिए बनाये गए क्रांति पथ पर चल पड़ती है. वास्तव में मां त्याग की मूर्ति कहलाती है. बचपन से बच्चा मां को अपने और परिवार की खातिर त्याग करते हुए देखता है, जिस वजह से ज्यादातर बच्चे उन्हें लेकर अधिक भावुक होते हैं. मदर्स डे जिस ‘मां’ की याद में मनाया जाता है, वे भी त्याग की मूर्ति थीं और उनकी बेटी जीवन में सबसे अधिक अपनी मां से ही प्रेरित हुई. मां की प्रेरणा से शुरू हुई मदर्स डे की शुरुआत ‘मेमोरिएलाइज़िंग मदरहुड’ पुस्तक के अनुसार, दुनिया भर की मांओं के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए मदर्स डे मनाने की शुरुआत 20वीं सदी में अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना जार्विस के प्रयासों से शुरू हुई थी. अन्ना अपनी मां और सामाजिक कार्यकर्ता एन रीव्स जार्विस के सामाजिक कार्यों और समर्पण से प्रेरित होती रहती थीं. एन रीव्स जार्विस ने स्त्रियों के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों और गृहयुद्ध के दौरान घायल सैनिकों की मदद करने के लिए एक मदर्स क्लब स्थापित किया था. बेटी अन्ना के प्रयास पर अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने वर्ष 1914 में आधिकारिक तौर पर मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे के रूप में मनाये जाने की घोषणा कर दी. जिस तरह किताबों में बेटी अन्ना द्वारा अपनी मां एन से प्रेरणा लेने की बात दर्ज है, उसी तरह हम किताबों के हवाले से कुछ ऐसे संतान की बात करेंगे, जिनके जीवन को सबसे अधिक उनकी मां ने प्रभावित किया. गांधी जी के देश के लिए जाने वाले सेवाकार्य पर मां का गहरा प्रभाव राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्त्रियों के प्रति अपार श्रद्धा और सम्मान रखते थे. वे उन्हें पुरुषों के बराबर का दर्जा देते थे. इसकी प्रेरणा उन्हें अपनी मां से मिली थी. महात्मा गांधी अपनी आत्मकथा, "द स्टोरी ऑफ़ माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ" में अपनी मां पुतलीबाई के उनके जीवन पर गहरे प्रभाव के बारे में विस्तार से चर्चा की है. बापू अपनी किताब में स्वीकार करते हैं कि धार्मिक आस्था, सत्य, अहिंसा और आत्म-अनुशासन की प्रेरणा उन्हें मां से मिली है. अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास और धार्मिक नियमों का सख्त पालन भी उन्होंने मां पुतलीबाई से सीखा था. मां के जीवन मूल्यों ने ही उनके जीवन को आकार दिया. गांधी बताते हैं, ‘उनकी मां सबसे कठिन व्रत लेती थीं और बीमारी के बावजूद भी उनका पालन करती थीं. उन्हें याद है कि उनकी मां व्रत रखती थीं, जिसमें वे प्रण लेती थीं कि जब तक सूरज नहीं देख लेती, तब तक कुछ नहीं खाएंगी. बारिश के मौसम में सूरज छिप जाने पर वे इंतज़ार करती रहतीं’. गांधी जी के अनशन, उपवास के पीछे उनकी मां का ही प्रभाव दिखता है. गांधीजी की मां ने कानून की पढ़ाई के लिए उनके इंग्लैंड जाने पर कुछ शर्तें रखीं, जो नैतिक सिद्धांतों को बनाए रखने और अपने मूल्यों के प्रति सच्चे रहने के महत्व में उनके विश्वास को दर्शाती है. गांधी की आत्मकथा से यह भी पता चलता है कि कैसे उनकी मां की शिक्षाओं और कार्यों ने उनके जीवन और बाद में उनकी सक्रियता और दर्शन को महत्वपूर्ण आकार दिया. बड़े घर की बेटी में मां आनंदी देवी बनीं पुत्र प्रेमचंद की प्रेरणा महान कथाकार प्रेमचंद की मां का नाम आनंदी देवी था. हालांकि उन्होंने बहुत छोटी उम्र में अपनी मां को खो दिया था. उन्होंने जितना भी अपनी मां को जाना था, मां का व्यक्तित्व उनके लेखन में स्पष्ट दिखता है. उनकी मां ने उनके लेखन को प्रभावित किया. वे अपनी कहानियों के अलग-अलग पात्रों में उनकी बातों और सदव्यवहार को डालते. माना जाता है कि अपनी मां के कुछ जीवन प्रसंगों से मिली प्रेरणा को उन्होंने "निर्मला" कहानी में डाला था. "बड़े घर की बेटी" में आनंदी के चरित्र की प्रेरणा उनकी मां आनंदी देवी ही बनी थीं. मां की ममता, दुलार और अनुशासन का अब्दुल कलाम पर प्रभाव भारत के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों में से एक और देश के ग्यारहवें राष्ट्रपति अवुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम (एपीजे अब्दुल कलाम) ने अपनी आत्मकथा ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’ में अपनी मां आशिअम्मा जैनुलाबिद्दीन को अपना आदर्श बताया है. उन्होंने किताब में अपनी मां की ममता, दुलार और अनुशासन के कई किस्से बताए हैं. मिसाइल मैन कलाम ने बताया कि उनकी मां अमीरी और गरीबी दोनों में सामान्य बनी रहतीं और किसी भी भौतिक वस्तु को पाने की इच्छा नहीं करतीं. वे हमेशा अपने बच्चों और पति का साथ देतीं. एक जीवन प्रसंग का हवाला देते हुए कलाम ने बताया कि वे सुबह अख़बार बेचकर घर लौटते और उनकी मां उन्हें रोटियां परोसतीं। एक बार कलाम मां से और रोटियां मांगते रहे और उनकी मां ने उन्हें अपना हिस्सा भी दे दिया. मां भूखी ही रह गईं. बाद में उनके भाई ने उन्हें इस बात से अवगत कराया. किताब में कलाम ने माना कि मां के त्याग और तपस्या का उनके जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव पडा. "विंग्स ऑफ़ फायर" में उन्होंने मां पर कविता भी लिखी है. अमिताभ के दिल में बसती हैं मां तेजी बच्चन की प्रेरणा “अमिताभ बच्चन जीवन गाथा " पुस्तक में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने लेखिका पुष्पा भारती से बताया है कि उनकी मां तेजी बच्चन ने उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उनकी शिक्षा, रहन-सहन का ढंग, समाज और परिवार के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने की चाहत का उनके जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा. अमिताभ बच्चन की मां तेजी बच्चन एक शिक्षिका और सामाजिक कार्यकर्ता थीं. उन्होंने अपने पति और प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन और परिवार के लिए बहुत त्याग किया. वे अमीर परिवार से ताल्लुक रखती थीं, लेकिन शादी के बाद सब कुछ छोड़कर हरिवंश राय के साथ सामान्य जीवन जीने लगीं. वे रंगमंच पर अभिनय भी करती थीं. तेजी बच्चन के ये दोनों गुण बेटे अमिताभ बच्चन के लिए प्रेरणादायी बने. अमिताभ बच्चन अपनी मां के बहुत करीब थे और दोनों के बीच एक मजबूत बॉन्डिंग थी. जब भी अमिताभ अपने करियर में असफल होते, मां उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करतीं. अमिताभ मां को महान आदमी का दर्ज़ा देते थे. आज भी अमिताभ अपनी मां को बहुत याद करते हैं और उनकी प्रेरक बातों को हमेशा अपने दिल में रखते हैं. बॉलीवुड के किंग शाहरुख खान के लिए मां लतीफ फातिमा थीं प्रेरणापुंज बॉलीवुड फिल्म समीक्षक और पत्रकार अनुपमा चोपड़ा ने ‘किंग ऑफ बॉलीवुड’ किताब लिखी है. इसमें शाहरुख खान की मां लतीफ फातिमा का उल्लेख प्रमुखता से किया गया है. पुस्तक में शाहरुख खान की मां लतीफ फातिमा खान के हैदराबादी सामाजिक कार्यकर्ता और फर्स्ट कैटेगरी की मजिस्ट्रेट के रूप में उनकी पृष्ठभूमि का विवरण दिया गया है. उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की करीबी मानी जाती थीं. शाहरूख ने किताब में बताया कि उनकी मां फातिमा बहुत अधिक उपलब्धियां हासिल करने वाली पहली कुछ मुस्लिम महिलाओं में से एक थीं. किताब में अभिनेता ने खुलासा किया कि उनकी मां ने हमेशा असफलता मिलने पर उन्हें प्रोत्साहित किया और उन्हें विशेष महसूस कराया. मां की प्रेरणादायी बातों के कारण ही शाहरूख को अपने जीवन और करियर पर विश्वास हुआ. शाहरूख ने बताया कि एक एक्टर के तौर पर सफल होने से पहले ही उनकी मां का सेप्टिसेमिया के कारण निधन हो गया. लेकिन जब वे टीवी और सिनेमा में रोल पाने के लिए डायरेक्टर-प्रोडूसर के पास चक्कर लगाया करते, तो रोल के लिए चुनाव नहीं होने पर उनकी मां उन्हें कभी हतोत्साहित नहीं होने देतीं. वे उनके प्रति विश्वास जतातीं और उन्हें सफल होने की दुआ देतीं. सचिन तेंदुलकर की मां रजनी ने दिया बेटे का भरपूर साथ अपनी आत्मकथा, "प्लेइंग इट माई वे" में क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने अपनी मां रजनी तेंदुलकर को एक अध्याय समर्पित किया है. इसमें उनके जीवन और करियर पर रजनी के प्रभाव और बेइंतहा प्यार की कई कहानियां शामिल की गई हैं. किताब में वे उन्हें अपनी प्रेरणास्रोत बताते हैं और अपनी यात्रा के दौरान उनकी निरंतर उपस्थिति को महसूस करने का वर्णन करते हैं. अपनी पुस्तक में मां के बारे में सचिन बताते हैं कि उनकी मां उन पर और उनके खेल पर अटूट विश्वास रखती थीं, खासकर उनके शुरुआती वर्षों के दौरान जब वे एक युवा और होनहार क्रिकेटर थे. मां ने कभी भी घरेलू आर्थिक कमी को उनके सामने जाहिर नहीं होने दिया और उनके लिए जरूरी क्रिकेट किट, क्रिकेट कोचिंग, पौष्टिक भोजन की कभी कमी नहीं होने दी. मां ने हर क्षण उनका मार्गदर्शन किया और क्रिकेट के प्रति उनके जुनून को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें जरूरी संबल भी दिया. सचिन अपने जीवन में मां की उपस्थिति का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि बचपन और पेशेवर करियर दोनों के दौरान उन्हें उनसे निरंतर समर्थन और प्रोत्साहन मिलता रहा. जब उन्होंने अपने करियर में मील के पत्थर हासिल किए और अपनी किताब की पहली प्रति मां को सौंपी, तो वे गर्व और खुशी से भर गईं. मां राज कुमारी निखंज को कपिलदेव ने बताया शक्ति स्तंभ पूर्व क्रिकेट विश्व कप विजेता और भारतीय क्रिकेट कप्तान कपिल देव और उनकी मां राजकुमारी निखंज की बॉन्डिंग को कपिलदेव की आत्मकथा ‘स्ट्रेट फ्रॉम माई हार्ट’ में बखूबी दर्शाया गया है. ‘स्ट्रेट फ्रॉम माई हार्ट’ में कपिलदेव बताते हैं कि वे अपनी मां राजकुमारी के आंखों के तारे थे. दरअसल कपिलदेव ने किशोरावस्था में ही अपने पिता को खो दिया था. उन्हें और उनके छह भाई-बहनों को उनकी मां ने ही पाल-पोसकर बड़ा किया. कपिल देव को उनकी मां प्यार से कुक्कू बुलाती थीं. किताब में वे याद करते हैं कि कैसे उनकी मां कमियों से जूझतीं और उनके लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने की कोशिश करतीं. आज भी कपिलदेव को याद है कि तंदुरुस्ती के लिए उनकी मां क्रिकेट के शुरुआती दिनों में उनसे बटर मिल्क पीने पर ज़ोर देती थीं. अपनी आत्मकथा ‘स्ट्रेट फ्रॉम द हार्ट’ में कपिलदेव बताते हैं कि चंडीगढ़ में उनके शुरुआती सालों को आकार देने में उनकी मां ने अहम योगदान दिया था. मां के बिना क्रिकेट में सफलता हासिल करना उनके लिए बेमानी था. इसलिए वे मां को अपने जीवन में “शक्ति स्तंभ” कहते हैं. प्रसिद्ध हस्तियों के अपनी मांओं को लिखे गए पत्र ‘डिअर ममा’ का हिंदी अनुवाद है- ‘सुनो मां’. लेखिका मोहिनी केंट ने अंग्रेजी में ‘डिअर ममा’ लिखा है, जिसका हिंदी में ‘सुनो मां’ के रूप में लेखक सुंदिप भूतोरिया ने अनुवाद किया है. इसमें विश्व की प्रसिद्ध हस्तियों के अपनी मांओं को लिखे गए पत्र शामिल किए गये हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, महामहिम दलाई लामा, चेरी ब्लेयर, सर क्लिफ रिचर्ड, जी पी हिंदुजा, किरण मजूमदार शॉ, अरशद वारसी, डॉ. करण सिंह, सर मार्क टुली, शर्मिला टैगोर, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, सुंदिप भूतोरिया, लॉर्ड पारेख, के पी सिंह, मिल्खा सिंह और अन्य प्रतिष्ठित हस्तियों के साथ ही कुछ आम नागरिकों ने अपनी मांओं को पुस्तक के लिए व्यक्तिगत पत्र लिखे हैं. मोहिनी केंट ने अपनी चैरिटी लिली अगेंस्ट ह्यूमन ट्रैफिकिंग की सहायता के लिए यह पुस्तक लिखी है. मां के लिए कविता अपनी मां पर किताब लिखने वाले मशहूर लोगों में मुनव्वर राना, निज़ार कब्बानी और कई अन्य प्रसिद्ध कवि और लेखक भी हैं. मुनव्वर राना तो अपनी मां पर लिखी कविता के कारण मशहूर हुए और कई पुरस्कार भी पाए. उन्होंने अपनी कविता "किसी को घर मिला..." में अपनी मां के बारे में जो लिखा, वह सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ. निज़ार कब्बानी ने अपनी कविता "मेरी मां को लिखे गए पांच पत्र" में अपनी मां के लिए अपने प्यार और उदासीनता को भी व्यक्त किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी का मां के प्रति प्रेम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अकसर सोशल साइट्स पर अपनी मां के बारे में कुछ न कुछ लिखते हुए देखा जाता है. वे बताते हैं कि वे आज जहां भी हैं, अपनी मां की वजह से हैं. इसलिए वे देश को अपनी मां की तरह मानते हैं और लोगों से भी ऐसा करने की अपील करते हैं. हालांकि अब उनकी मां की मृत्यु हो गई है, लेकिन उनकी मां बेटे के प्रधानमंत्री बनने पर भी गुजरात में सामान्य जीवन जीती रहीं. कभी उनके साथ रहने प्रधानमंत्री आवास पर नहीं आईं. अपने एक साक्षात्कार में मोदीजी ने स्पष्ट किया था कि मां उनके साथ नहीं रहती हैं, लेकिन जब वह देर से घर लौटते हैं, तो उनकी मां को यह पसंद नहीं आता है. आखिरकार एक मां हमेशा एक मां होती है. मां-बेटे के संबंध पर लिखी गई विश्व प्रसिद्ध किताबें एडम हैस्लेट द्वारा लिखी गई मदर्स एंड सन्स डगलस स्टुअर्ट द्वारा लिखी गई शुग्गी बैन लोरेन हैंसबेरी की एराइजिंग इन द सन एमर्सन एगरिक्स की मदर एंड सन: द रेस्पेक्ट इफेक्ट मेलिसा हैरिसन की मदर टू सन विं’ग्स ऑफ़ फायर’ में एपीजे अब्दुल कलाम की कविता "मुझे आज भी वह दिन याद है जब मैं दस साल का था, अपने बड़े भाइयों और बहनों की ईर्ष्या के कारण तुम्हारी गोद में सो रहा था। पूर्णिमा की रात थी, मेरी दुनिया को केवल तुम ही जानती थी माँ!, मेरी माँ! जब आधी रात को, मैं अपने घुटनों पर गिरते आँसुओं के साथ उठा तुम अपने बच्चे का दर्द जानती थी, मेरी माँ। तुम्हारे दुलारने वाले हाथ, कोमलता से दर्द को दूर करते हुए तुम्हारा प्यार, तुम्हारी देखभाल, तुम्हारे विश्वास ने मुझे शक्ति दी, बिना किसी डर के और उसकी शक्ति के साथ दुनिया का सामना करने के लिए। हम महान न्याय दिवस पर फिर मिलेंगे। मेरी माँ!"

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