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जापान नहीं चीन से आया है टमाटर जैसा जापानी फल

जापान नहीं चीन से आया है टमाटर जैसा जापानी फल फलों की दुकान पर एक लाल नारंगी फल को देखकर दुकानदार से मैंने पूछा, ' ये फलों के बीच बड़े-बड़े टमाटर क्यों रखे हुए हैं? ये अमेरिकी हैं क्या?' दुकानदार ने नहीं कहने के लिए सिर हिलाया और बताया, ' ये जापानी फल हैं। सेब और अनार के बीच स्वाद वाला यह फल यहां खूब पसंद किया जाता है। सचमुच थोड़ा कम मीठे स्वाद वाला यह फल अनोखा है। जापानी फल अंग्रेजी में persimmons कहलाता है। इस फल को अंग्रेजों ने चीन से यहां 1920-21 में हिमाचल के शिमला में लाया। अब हिमाचल के ठंडे प्रदेशों में किसान इस फल को खूब उगाते हैं। इसके पत्ते कठोर होते हैं, जिसमें मछलियों को लपेटकर प्रीजर्व किया जाता है। चीन में यह 2 हजार से भी अधिक सालों से उगाया जाता रहा है। ऐसी कहानी है कि काफी समय पहले जापान के शाही घराने के लोगों के लिए  यह फल उपजाया जाता था, लेकिन आम लोगों के बीच लोकप्रिय होने पर इसकी खेती वहां अत्यधिक होने लगी। दरअसल,  इसकी खेती ठंडे प्रदेश, लेकिन जहां अच्छी खिली धूप भी निकलती हो, वहां होती है।   इसका बोटानिकल नाम Diospyros kaki  है। दुनिया में इसकी ...

कँटीले इस्कुस का स्वाद है निराला

   कंटीले इस्कुस का स्वाद है निराला जब बात चली है सब्जी की, तो लगे हाथ इस्कुस के बारे में भी बता ही दूं। एक शाम एक पड़ोसन कागज के ठोंगे में पांच-छह फल जैसा कुछ दिया। मैंने उसे देखकर सोचा-'अच्छा यहां पहाड़ों पर कंटीले अमरूद भी होते हैं, क्योंकि वह अमरूद जैसा ही दिख रहा था। तभी उन्होंने मेरी सोच पर विराम लगाते हुए कहा-ये पहाड़ी सब्जी है-इस्कुस। इसे मसाले के साथ भूनकर पकाया जाता है। मेरे भाई ने बताया कि इसे लौकी-आलू के इस्टू( बिहार) की तरह पकाओगी तो सुस्वादु लगेगा। इस सब्जी का स्वाद वह काठमांडू में ले चुका था। नेपाल के पहाड़ी इलाके में यह सब्जी खूब पसंद की जाती है। यदि आप यू ट्यूब पर सर्च करें, तो नेपाली भाई-बहन अपनी भाषा में इस सब्जी के बनाने की विधि बताते नजर आएंगे।  वास्तव में इस्कुस या cheyote भारत का नहीं, बल्कि Mexico का है। यह न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया से होते हुए भारत आया। यह gourd यानी cucurbitaceae फैमिली का है। इसे Buddha hand melon, बंगलोर ब्रिंजल, चाऊ चाऊ भी कहते हैं। यदि इसके छिलके उतार कर कच्चा खाना चाहें, तो स्वाद खीरे की तरह लगेगा। विटामिन सी, एमिनो एसिड, फाइबर ...

चाइनीज मोमोज पर भारी हिमाचल के सिड्डू .

  चाइनीज मोमोज पर भारी हिमाचल के सिड्डू कल हम लोगों ने हिमाचल की एक बेहद जायकेदार Street food  खाई। नाम है उसका सिडडू। स्टीम पर पकने के कारण यह आपको चाइनीज परिवार का सदस्य लग सकता है, लेकिन वास्तव में मोमोज से यह कई गुणा स्वादिष्ट है। इसे बिहार के पिट्ठा या यूपी के फर्रे का समव्यंजन कह सकते हैं। यह शाम के स्नैक्स के रूप में भी यहां लिया जाता है। भले ही इसे कुल्लू का जायकेदार व्यंजन माना जाता है, लेकिन ज्यादातर हिमाचल वासी इसे बड़े चाव से खाते हैं। गेहूं  के आटे में जरूरत के हिसाब से ड्राई यीस्ट डालकर उसे गूंथा जाता है। इस आटे को कई घण्टे तक छोड़ दिया जाता है, जिससे यह  फ्लपी हो जाता है। फिर उसमें पिसी हुई धुली उरद की दाल, पिसी अदरक, छिलके उतार कर पिसे अखरोट व हरी धनिया पत्ती का भरावन डालकर उसे गुझिया का शेप दे दिया जाता है।  फिर इसे स्टीम पर पकाया जाता है। जो सिड्डू हमें खाने को मिला था, उसका आकार बहुत बड़े गुझिया जैसा था। पकने के बाद उसे पीसेज में काटकर बिना छिलके के पानी में भिगोए अखरोट-धनिया पत्ती की चटनी व लहसुन-लाल मिर्च की चटनी के साथ परोसा जाता है। ऊपर से दे...

औषधीय गुणों से भरपूर है लिंगड़ा

  गूगल फोटोज में अभी गुलदस्ते जैसी एक सब्जी की फोटो मिली। याद आया कि जून महीने में एक बच्चा इस सब्जी को टोकरे में सजाकर बेच रहा था। पूछने पर नाम लिंगड़ा बताया। मैं तो यह सब्जी Fiddlehead पहली बार देख रही थी। मुझे तो बड़े बड़े रोएं वाली यह सब्जी खूबसूरत चकती या घिरनी जैसी दिख रही थी। एक दिल अजीज पड़ोसन ने बताया कि पहाड़ की होने के कारण वे इसे बनाना जानती हैं और फिर उन्होंने ही इसे बनाने का बीड़ा उठाया। जो सुंदर होते हैं, उनके थोड़े नाज-नखरे तो होते ही हैं। लिहाजा उसके रोएं की साफ-सफाई, कटाई और फिर उसे बनाने में उन्हें कई घण्टे लग गए। इसका स्वाद रोज-रोज खाई जाने वाली हरी सब्जियों से कुछ अलग तो जरूर था, लेकिन बेहद खास तो नहीं था। कुछ-कुछ बीन्स जैसा लगा। हिमाचल में लिंगरी या लिंगड़ू, उत्तराखंड में लेंगड़ा, कश्मीर में करसोर कही जाने वाली यह बरसाती सब्जी औषधीय गुणों से भरपूर होती है। एंटीओक्सिडेंट और ओमेगा 3 & 6 फैटी एसिड के साथ-साथ इसमें विटामिन, कैल्शियम और आयरन प्रचूर मात्रा में पाया जाता है। इसे बनाने के लिए बहुत तेल-मसाले की भी जरूरत नहीं पड़ती है। आप चाहें, तो इसका अचार डाल सकते हैं। सला...

बिच्छू डंक मार जाएगा...

एक दिन कोई व्यक्ति सड़क किनारे खड़े होकर किसी दूसरे व्यक्ति से बातचीत करने लगा। तभी उसका हाथ सड़क किनारे उगे किसी जंगली पौधे से जा लगा। उसे महसूस हुआ कि किसी बिच्छू ने डंक मार दिया है। पूरे हाथ में तेज झनझनाहट और जलन होने लगी। दोस्तो,  बिच्छू की तरह डंक मारने वाला यह पौधा बिच्छू घास है। यह  औषधीय पौधा stinging nettle समूचे हिमाचल में पाया जाता है, जिसका botanical name Urtica Dioica है। यह कंडाली, सिसौण, अल्द, बिच्छू बूटी, बिच्छू पान, वृष्चिक आदि| नामों से भी जाना जाता है।  गठिया, जोड़ों के दर्द, मधुमेह, खून साफ करने, बाल झड़ने, कील मुहांसे खत्म करने यहां तक कि वजन कम करने की आयुर्वेदिक दवाओं में इस्तेमाल किया जाता है। इसकी पत्तियों से हर्बल चाय तैयार की जाती है। इसकी सब्जी बड़ी सुस्वादु होती है, पर सावधान बिना इसे समझे-बूझे इन्हें तोड़ने न लग जाएं। नहीं तो बिच्छू डंक मार जाएगा...

अमेरिका से आये शिमला में सेब

कल घर पर एक रिसर्च स्टूडेंट आये, जिनसे मीठे चमकदार सेब की कहानी पता चली। शिमला में जो बहुतायात में लाल, रसीले और मीठे सेब के बागान हैं, वे सेब स्थानीय नहीं, बल्कि अमेरिका से लाये गए हैं। अमेरिका से सेब को सत्यानंद स्टोक्स यानी सैमुएल इवान्स स्टोक्स जूनियर ने यहां लाया था। सैमुएल शिमला आये थे कुष्ठरोगियों की सेवा करने, लेकिन उनके पिता को यह सब पसंद नहीं आया। वे उन्हें एक सफल व्यवसायी बनाना चाहते थे। सैमुएल ने अनुभव किया कि शिमला में अमेरिका जितनी ही ठंड पड़ती है, तो फिर क्यों न सेब की खेती यहां की जाए। यह संभवतः 1905-1916 की बात रही होगी। उस समय पेड़ पौधों के कलम को विदेश से भारत लाना जुर्म था। उन्होंने एक पेन के अंदर सेब की कलम को रखा और उसे भारत ले आये। यहां एक पौधे के साथ लगाकर देखा, तो सेब के पौधे की जड़ें जमीन में लग गईं। यह बात सैमुएल ने मां से बताई और  शिमला में ही बसने की चाहत जाहिर की। कहानी है कि आगे मां ने अमेरिकी सेब के बीज और शिमला में जमीन खरीदकर सैमुएल को दी।यहां आकर सैमुएल ने अपना नाम बदलकर सत्यानन्द रख लिया और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। जलि...

नोखू-धन्ना और राजा संसारचंद की प्रेम कथा

धर्मशाला क्या मुझे तो लगता है कि आप हिमाचल के किसी भी इलाके में चले जाएं, गाहे-बगाहे अपनी भेड़-बकरियों की झुंड को हांकते चरवाहे आपको मिल जाएंगे। इन्हें आप सुच्चे स्थानीय (जिनमें जीन की कोई मिलावट नहीं) कह सकते हैं। मेरे विचार से संभवत: इसी वजह से हिमाचल की  लोककथाओं में चरवाहे शामिल हैं। खासकर यहां के लोक में घुली-मिली प्रेम कथाओं में तो जरूर। ये चरवाहे आज भी अपनी विशेष पोशाक पहनते हैं, जो इन्हें प्राचीन समय और अपनी संस्कृति से जुड़े होने का आभास दिलाता है। यूं ही एक दिन ईवनिंग वॉक करते समय अपनी भेड़-बकरियों की झुंड के साथ एक चरवाहा नजर आया। उससे तो बात नहीं हाे पाई, लेकिन बगल से गुजर रहे एक पथिक, जिन्हें अक्सर आते-जाते देखा करती थी। हिमाचल के किस्से-कहानियों के बारे में जानने की गरज से मैंने  स्वयं पहले करते हुए उनसे  पूछ ही लिया-ये चरवाहे कहां रहते होंगे? इनका अपना कोई निश्चित ठिकाना नहीं होता है। ये सालों भर घूमते रहते हैं। भेड़-बकरियां ही उनकी रोजी-रोटी हैं। उन्हीं को पहाड़-जंगल-मैदान में चराते हुए अपना जीवन व्यतीत कर लेते हैं। जब पहाड़ के नीचे बसे ग...